‘करंसी वॉर से ग्लोबल मंदी का खतरा’

मॉर्गन स्टैनली के रुचिर शर्मा ने आगाह किया है कि चीन में घटती ग्रोथ से दुनियाभर में मंदी आ सकती है। ग्लोबल ग्रोथ यूं भी आईएमएफ के अनुमान से नीचे चली गई है और इमर्जिंग मार्केट्स खासे पस्त दिख रहे हैं। डॉलर के मुकाबले एक के बाद एक करंसी गिरती जा रही है। ब्राजील का रियाल इस साल के शुरू से अब तक 23% कमजोर हो चुका है।

रूसी रूबल 2013 से अपनी आधी से ज्यादा वैल्यू गंवा चुका है। इससे लगता है कि इंपोर्ट्स घटाने और एक्सपोर्ट्स बढ़ाने के लिए एक-दूसरे की होड़ में अपनी करंसी की वैल्यू घटाने का दौर शुरू हो गया है। यह होड़ सुस्त होती चाइनीज ग्रोथ का असर कई गुना बढ़ा देगी और इसके कारण भीषण मंदी का दौर शुरू हो सकता है।

2008 में आई वैश्विक मंदी ने दुनियाभर में इकनॉमिक ग्रोथ पर असर डाला था। फिर भी तब देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए न तो करंसी की वैल्यू घटाने की होड़ मचाई थी और न ही इंपोर्ट पर भारी-भरकम ड्यूटी लगाई थी। इकनॉमिक हिस्ट्री ने सबक दिया है कि 1930 के दशक में आई महामंदी करंसीज की वैल्यू घटाने और इंपोर्ट टैरिफ बढ़ाने की होड़ के कारण बढ़ गई थी।

जब हर देश ने इंपोर्ट घटाया, तो उसका असर दुनियाभर में एक्सपोर्ट घटने के रूप में भी सामने आया था और समूची इकनॉमिक एक्टिविटी प्रभावित हुई। इस तरह डीवैल्यूएशन की होड़ और ऊंचे टैरिफ के दुष्चक्र में ग्लोबल इकॉनमी फंस गई थी।

जनवरी से रुपया 3.4% कमजोर हो चुका है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुने गए तो डॉलर के मुकाबले रुपया 59 पर था। तबसे रुपया 10% कमजोर हो चुका है, लेकिन एक्सपोर्ट्स में लगातार 8वें महीने गिरावट आई है।

करंसीज की वैल्यू घटाने की होड़ का एक असर यह भी हुआ कि लगभग सभी दूसरी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर कुछ मजबूत हुआ। अब तक एक अपवाद चाइनीज यूआन के रूप में था, लेकिन पिछले सप्ताह चीन ने भी इसकी वैल्यू 3% घटा दी। कुछ एक्सपर्ट्स को डर है कि आने वाले महीनों में इसमें 10% गिरावट आ सकती है। उन्हें डर है कि चीन अपनी सुस्त होती इकॉनमी को रिवाइव करने के लिए एक्सपोर्ट बढ़ाना चाहता है। चीन 7% जीडीपी ग्रोथ हासिल करने का दावा कर रहा है, लेकिन बिजली की खपत, मैन्युफैक्चरिंग ऑर्डर्स और रेलवे फ्रेट पर नजर रख रहे एनालिस्ट्स का कहना है कि ग्रोथ महज 5% रह सकती है। उनका कहना है कि इससे कम्युनिस्ट पार्टी में घबराहट फैल गई है, जिसका मानना है कि इकनॉमिक ही नहीं, पॉलिटिकल स्टेबिलिटी के लिए भी तेज ग्रोथ जरूरी है।

आशावादियों का मानना है कि चीन यूआन की वैल्यू और नहीं घटाएगा, लेकिन निराशावादियों को डर है कि चीन अपनी करंसी को घटाता रहेगा ताकि एक्सपोर्ट्स को रफ्तार दी जा सके।

कुछ भारतीय विश्लेषक भी रुपये की वैल्यू काफी ज्यादा घटाने की आवाज उठा रहे हैं। हालांकि सी रंगराजन, प्राची मिश्रा, साजिद चिनॉय और जहांगीर अजीज ने जो स्टडीज की हैं, उनसे पता चलता है कि इंडियन एक्सपोर्ट ग्रोथ का एक्सचेंज रेट से मजबूत ताल्लुक नहीं है और यह काफी हद तक ग्लोबल ग्रोथ से जुड़ी है। लिहाजा जैसे ग्लोबल ट्रेंड दिख रहे हैं, उसमें रुपये की वैल्यू घटाने से इंडियन एक्सपोर्ट्स का रिवाइवल नहीं होगा।

भारत को करंसीज की वैल्यू घटाने की होड़ के बारे में आवाज उठानी चाहिए और आईएमएफ को भी करंसी वॉर रोकने के कदम उठाने के लिए तैयार करना चाहिए। चीन की ग्रोथ सुस्त होने भर से हो सकता है कि दुनिया में मंदी न आए, लेकिन करंसी वॉर से ऐसा जरूर हो जाएगा।

 

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