अन्न का आदर

Gandhiji

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महात्मा गांधी और जमना दास बजाज एक पंगत में बैठ कर एक साथ भोजन कर रहे थे। गांधी जी को पकवान बहुत लुभा रहे थे। जमना दास जी वैसे ही बहुत कम खाते थे वास्तव में वह देश का अनाज बहुत बचाते थे। गांधी जी ने उनके मना करने पर भी एक कचौड़ी उनके पत्तल में डाल दी, जैसे अपनी कोई नई राजनीतिक गोट उछाल दी।

वह कूटनीतिज्ञ की भान्ति चुपचाप देखते रहे कुछ बोले नहीं जल्दी से मन के पत्ते खोले नहीं। उन्होंने जब उसे खाने का कोई उपक्रम नहीं किया तो गांधी जी को लगा कुछ अलग से हुआ है। उनकी दी हुई कचौड़ी को कोई क्यों नकारेगा, इससे तो वह अपना भविष्य ही संवारेगा। बाहर जा कर दस लोगों को बतायेगा कि मुझे बापू ने स्वयं परोसा था, कितने स्नेह से भरा उनका न्यौता था।

जमना दास उसे खा नहीं रहे थे। उसका कारण भी बता नहीं रहे थे। बहुत पूछने पर बोले, “सोचता हूं कि अन्न का अनादर करके इसे कूड़े में डालूं अथवा बीमार होने के लिए पेट के कूड़ा घर में समा लूं। मेरे लिए दोनों ही स्थितियां विकट हैं, आप तो सब जानते हैं क्योंकि आप सत्य के बहुत निकट हैं। जैसा देगें आदेश मानूंगा। ”

बापू जानते थे कि बाहर जूठन खाने वालों की कतार है, यहां पर भंडार में पकवानों की भरमार है। बापू ने तो जानबूझ कर जूठन को बढ़ाया था, जूठन खाने वाला वर्ग भी तो इसी समाज का हम साया था।

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