विचार की शक्ति

riverविख्यात ब्रिटिश लेखक मार्क रुदरफोर्ड के बचपन की घटना है। एक दिन वह समुद के किनारे बैठे थे। दूर सागर में एक जहाज लंगर डाले खड़ा था। वह जहाज तक तैर कर जाने के लिए मचल उठे। मार्क तैरना तो जानते ही थे, कूद पड़े समुद में और तैर कर जहाज तक पहुंच गए। मार्क ने जहाज के कई चक्कर लगाए। मन खुशी से झूम उठा। विजय की खुशी और सफलता से आत्मविश्वास बढ़ा। लेकिन जैसे ही उन्होंने वापस लौटने को किनारे की तरफ देखा तो निराशा हावी होने लगी, किनारा बहुत दूर लगा। बहुत अधिक दूर।

सफलता के बाद भी निराशा बढ़ रही थी, अपने ऊपर अविश्वास हो रहा था। जैसे-जैसे मार्क के मन में ऐसे विचार आते रहे उनका शरीर वैसा ही शिथिल होने लगा। फुर्तीले नौजवान होने के बावजूद बिना डूबे ही डूबता सा महसूस करने लगे। लेकिन जैसे ही उन्होंने संयत होकर अपने विचारों को निराशा से आशा की तरफ मोड़ा, क्षण भर में ही चमत्कार सा होने लगा। वह अपने अंदर परिवर्तन अनुभव करने लगे। शरीर में एक नई शक्ति का संचार हुआ। वह तैरते हुए सोच रहे थे कि किनारे तक नहीं पहुंचने का मतलब है मर जाना और किनारे तक पहुंचने का प्रयास है डूब कर मरने से पहले का संघर्ष। इस सोच से जैसे उन्हें संजीवनी मिल गई। उन्होंने सोचा कि जब डूबना ही है तो सफलता के लिए संघर्ष क्यों न करें। भय का स्थान विश्वास ने ले लिया। इसी संकल्प के साथ वह तैरते हुए किनारे तक पहुंचने में सफल हुए। इस घटना ने उन्हें आगे भी काफी प्रेरित किया।

You must be logged in to post a comment Login